Friday, February 4, 2011

अजीब है न

आज मेरे मोबाइल पर एक सन्देश आया, जिसे पढ़कर मुझे केवल दुःख ही नहीं, बल्कि अफ़सोस भी हुआ है। अब यही सन्देश मैं आपलोगों से भी साझा करना चाहता हूँ। साथ ही यह भी चाहूँगा की आप इस सम्बन्ध में अपनी बहुमूल्य टिपण्णी जरूर दें।

किसी गरीब को २० रुपये देना बहुत ज्यादा लगता है। वहीँ अगर होटल में टिप देना हो तो यही राशि बेहद कम लगती है। तीन मिनट के लिए भगवान् को याद करना काफी मुश्किल है, लेकिन तीन घंटे की फिल्म देखना आसान होता है। पूरे दिन मेहनत के बाद जिम जाने से नहीं थकते, लेकिन जब माँ-बाप के पैर दबाना हो तो हम थक जाते हैं। वेलेंटाइन डे के लिए हम पूरे साल इंतज़ार करते हैं, लेकिन मदर्स डे कब है, हमें पता ही नहीं होता।

Friday, January 7, 2011

डू योर सेल्फ ब्रांडिंग

                             
नए साल के साथ-साथ उत्साह भी नया है, लेकिन जो कल का वक्त था वह आज नहीं है और जो आज का है वह कल नहीं रहेगा। वक्त का पहिया हमेशा अपनी रफ्तार से दौड़ता रहता है और जो वक्त की रफ्तार से कदम मिला कर चलता है, वही सिकंदर कहलाता है...

आज के प्रोफेशनल वर्ल्ड में हर यूथ की चाहत होती है कि सामने वाला उसे जाने। उसकी भी कोई मार्केट वैल्यू हो या कोई आइडेंटिटी हो। लेकिन इन चाहतों के बीच वे शायद एक महत्वपूर्ण फैक्ट नजरअंदाज कर जाते हैं कि अगर उन्हें खुद की कोई वैल्यू या आइडेंटिटी चाहिए, तो उसके लिए जरूरी है ‘सेल्फ ब्रांडिंग’। हां, अगर कॅरियर ग्राफ को एक नई ऊंचाई देनी है, तो फिर सेल्फ ब्रांडिंग से दूसरा और बेहतर विकल्प हो ही नहीं सकता। इक्कीसवीं सदी का एक दशक बीत चुका है और हम अब एक डिजिटल वर्ल्ड में प्रवेश कर चुके हैं। इस दुनिया में खुद को प्रेजेंट करना बेहद आसान होने के साथ ही और भी महत्वपूर्ण हो गया है। खासतौर पर उन यूथ के लिए  जो अपने भविष्य को लेकर काफी कांशस हैं।
क्या है सेल्फ ब्रांडिंग
हम और आप यह भलीभांति जानते हैं कि हर किसी में कुछ न कुछ बातें खास होती हैं, जो उन्हें अन्य से अलग करती हैं। बस जरूरत होती है, तो उन्हें परखने व तराशने की। वैसे जो इन खासियतों को समझने लगते हैं, वे इंटरव्यूअर को इंप्रेस करने में ज्यादा सफल होते हैं। बानगी के तौर पर जब भी आप इंटरव्यूअर या एम्प्लॉयर्स के सामने होते हैं, तो आपके पास फर्स्ट इंप्रेशन के लिए सिर्फ एक से डेढ़ मिनट का ही समय होता है। आज यह सब आप डिजिटल वर्ल्ड के जरिए भी आसानी से कर सकते हैं।
कॅरियर लिहाज से कैसा
वर्तमान संदर्भ में कहा जाए कि इंटरनेट के जरिए आज लगभग चीजें संभव है, तो शायद ऐसा कहना कतई गलत न होगा। आज इंटरनेट की दुनिया में नेटवर्किंग साइट खासतौर पर प्रोफेशनल नेटवर्किंग साइट्स जैसे- लिंक्डइन, सिलिकॉनइंडिया, फेसबुक आदि के जरिए यूथ आसानी से अपनी ‘सेल्फ ब्रांडिंग’ कर सकते हैं। लेकिन हां, एक चीज का विशेष ध्यान रहे किआप अपने डिजिटल रिलेशंस किसी सही राह पर ले जाएं। इसके इतर यह भी ख्याल रहे कि आप जिस नेटवर्किंग साइट विशेष से ताल्लुकात रख रहे हैं, वह आपके कॅरियर ग्राफ को हाइट देने के लिहाज से सही है या नहीं।
प्रोफाइल हो सटीक
प्रोफेशनल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए आप कई प्रोफेशनल लोगों से जुड़ते हैं, इनमें कई तो एम्प्लॉयर भी होते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि इन नेटवर्किंग साइट्स पर आप अपने प्रोफाइल में सटीक संदेश प्रेषित करें। ऐसा करने से एम्प्लॉयर को आपसे संबंधित चीजें समझने में आसानी होगी। आजकल वैसे भी नेटवर्किंग साइट्स से जुड़े लोगों की प्रोफाइल समीक्षा कर एम्प्लॉयर द्वारा नियुक्ति का चलन हो गया है। होता यूं है कि साइट्स के जरिए विचार का आदान-प्रदान करते वक्त मिलने वाली रोजक जानकारी से भी सामने वाला व्यक्ति प्रभावित होता है। फ्रेशर्स जो रोजगार की तलाश में हैं, उनके लिए सुझाव के तौर पर यह है कि वे अपनी प्रोफाइल में ऐसा कुछ न लिखें, जिससे एम्प्लॉयर्स पर उल्टा असर पड़े। साथ ही अपने नेटवर्क में ऐसे लोगों को जोड़ें, जो वास्तव में आपका व्यक्तित्व दर्शाता हो।

प्रोफशनल नेटवर्किंग साइट्स
सिलिकॉन इंडिया
लिंक्डइन
फेसबुक
अपना सर्कल
कनेक्शंस

Wednesday, December 1, 2010

आंसुओं की वो चमक आज भी याद है

              खुशियों के आंगन में कब गम का पहरा लगा, पता ही न चला। मुझे आज भी उनकी आंखों से बहते आंसुओं की वो चमक याद है। तब कमरे में अंधेरा था और वहां मौजूद दो लोगों के होंठ, जैसे सिल से गए थे। वातावरण बिलकुल शांत। आवाज़ आ रही थी, तो सिर्फ सांसों की। कमरे में जो थोड़ी बहुत रोशनी थी, उसमें खिला सा एक मासूम चेहरा ठीक मेरी नज़रों के सामने उस ग़मगीन माहौल को मुझसे छुपाने की कोशिश कर रहा था। आखिर कब तक छुपा पता। मोती रूपी आंसू एक-एक कर नेत्र सीमा के बहार आ ही गये।
यह मंजर था मेरी उससे दूसरी मुलाकात का। दुर्भाग्य से यह वह दिन था, जब किसी अनजान के समक्ष मेरी ख़ुशी को प्रस्तुत होना था। ऐसी परिस्थिति से शायद ही किसी का सामना हुआ होगा। इस मुलाकात से चार दिन पहले जिन खुशियों के सहारे अपने गांव गया था, मुझे अंदाज़ा भी न था कि जिंदगी के इस पड़ाव पर आकर ऐसे कड़वे सच से कभी सामना भी होगा।

Friday, September 10, 2010

कभी जो करीब था मेरे

कभी जो करीब था मेरे

कभी जो करीब था मेरे
आज क्यूँ दूर होता जा रहा है
क्या थी मेरी गलती
जो पल में मुझे भुला रहा है
शायद समझ न पाया वह मुझे
या समझना चाहता नहीं है
क्यूँ मेरे प्यार को
यूँ ही बेवफाई का नाम दे रहा है
जहाँ मेरी एक मुस्कान से
जगमगा उठती थी उसकी दुनिया
आज उसी मुस्कान को
फरेब समझ रहा है
जिसको मेरे हाथ का साथ था प्यारा
क्यों मेरे हाथों को
जंजीर समझ रहा है
कभी जो करीब था मेरे
क्यूँ दूर होता लग रहा है

लेखिका मेरी सखी है...
और प्यार से उन्हें हम शिव बुलाते हैं...

Saturday, August 21, 2010

पापा कहते हैं, बड़ा नाम करेगा

 

पापा कहते हैं, बड़ा नाम करेगा...। ये चंद अलफाज हर पिता की भावनाओ को कहीं न कहीं व्यक्त करते हैं, लेकिन शहरों के बिगड़ते माहौल ने इन भावनाओं को घायल कर दिया है। जिंदगी के हर छोटे-से-छोटे सपने साकार करने वाले मां-बाप को उनके सपनों के तोहफे के रूप में केवल आस ही नसीब होती है। उनके द्वारा जलाए गए संस्कार रुपी ज्योति, शहर आते ही मद्धम होने लगती है।
सपनो से तेज भागती इस दुनिया में लड़का खुद को संभाल नहीं पाता और सही गलत का चुनाव करने की शक्ति खो बैठता है। इस नई दुनिया की हर चीज़ नई होती है, नए सहपाठी, नए शिक्षक और नए वातावरण। पर ये नई दुनिया कब उसकी वास्तविकता को खत्म कर देती है, पता ही नहीं चलता । दरअसल जिस लक्ष्य के साथ दूसरी शहर में उनका आना होता है, वे उस लक्ष्य व अपने माता-पिता के सपने को दरकिनार कर कुछ और ही बन जाते हैं। यहां उन्हें कुछ सहपाठी, शराब -सिगरेट आदि मोहने लगते हैं। यही नहीं बल्कि लड़कियों के नम्बर तक हासिल करना भी किन्हीं-किन्हीं के लक्ष्य तक बन जाते हैं। वे इस दुनिया में इतने रम जाते हैं कि देर रात जगने से लेकर देर से कॉलेज जाने तक को मजबूर हो जाते हैं। वास्तव में यह सब कुछ संगत का ही असर होता है।
सच ही कहा है हमारे बुजुर्गों ने, जैसी संगत वैसी रंगत। इसके साथ ही वह अपने जेब खर्च पर भी पकड़ नहीं बना पाते, जिसके कारण छोटी-मोटी नौकरी की तलाश फिर उधारी और बाद में कर्जे की मकड़जाल उन्हें जकड़ लेती है। एक पिता अपने बेटे को पढ़ाने के लिए पैसे कैसे इकट्ठा करता है, यह शायद उन युवाओं का पता नहीं, लेकिन इसका इल्म भी उन्हें जल्द ही हो जाएगा, जब वे खुद कमाने लायक हो जाएंगे। बहरहाल जिसे अच्छी संगत की सौगात मिली वह कामयाबी के शिखर पर पहुॅच जाता है और जिसे बुरी संगत मिली, वे अपनी जिंदगी को बर्बादी के अंधेरे में डुबो लेते हैं। यह अंधेरा न केवल उस चिराग को बुझाता है, बल्कि उस परिवार के लिए खून के आंसू भी छोड़ जाता है। सपनों से भरी उन आंखो में घुटन सी महसूस होती है, जो जीवन रहते भी जीने नहीं देती है। अरे! जरा उन बूढ़े माता-पिता से पूछो, जो दिन-रात मेहनत-मज़दूरी कर, बिना चैन की नींद सोए आप जैसे ही लाड़ले की पढ़ाई का बोझ ढोते हैं।  अगर इसी प्रकार युवावर्ग बिगड़ता चला जाएगा, तो वास्तव में एक-न-एक दिन उसका उज्वल भविष्य अंधकार की गहराइयों में डूब जाएगा।

लेखक मेरे छोटे भाई समान हैं
संदीप  सिंह, फिरोज़ाबाद
  

Thursday, August 5, 2010

कोइ तो सुने मेरे दिल को...






















कोइ तो सुने मेरे दिल को
कि वो क्या चाहता है...
नफ़रत भरी दुनिया से प्यार चाहता है...
प्यार भरे हाथ का एक साथ चाहता है...
दुनियादारी से परे अपनी एक दुनिया चाहता है...
मीठे बोल का एहसास चाहता है...
कोइ तो सुने मेरे दिल को...

लेखिका मेरी सखी है...
और प्यार से उन्हें हम शिव बुलाते हैं...