Tuesday, April 27, 2010

आईपीएल बना बेहतर प्लेटफॉर्म

विवादों से घिरे आईपीएल के सीजन-3 में भले ही कई बड़े राजनेता और आईपीएल से जुड़ी हस्तियों का बंटाधार हुआ, लेकिन इस फटाफट क्रिकेट ने कई खिलाड़ियों को एक ऐसा प्लेटफॉर्म दिया, जिससे उनके भविष्य के सितारे तो चमकेंगे ही, साथ-साथ भारतीय क्रिकेट टीम को एक मजबूत स्थिति भी प्रदान की है। आईपीएल से उन्हें न केवल पैसा मिला, बल्कि बेहतरीन खेल दिखाने का अनुभव भी मिला।

आईपीएल कई खिलाड़ियों के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एंट्री और वापसी कर भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए एक अच्छे प्लेटफॉर्म के रूप में साबित हुआ है। भारतीय खिलाड़ियों में रोहित शर्मा, आरपी सिंह (डेक्कन चाजर्स ) और आशीष नेहरा (डेल्ही डेयरडेविल्स) की आईपीएल में प्रदर्शन के बाद ही भारतीय टीम में वापसी हो सकी थी, इसके अलावा बाएं हाथ के स्पिनर प्रज्ञान ओझा को 2009 विश्वकप ट्वेंटी-20 के लिए दक्षिण अफ्रीका में हुए आईपीएल में शानदार प्रदर्शन के बाद ही चुना गया था। वहीं इस साल पीयुष चावला (किंग्स इलेवन), विनय कुमार (रॉयल्स चैलेंजर्स) और मुरली विजय (चैन्नई सूपर किंग्स) को आईपीएल सीजन-3 में बेहतर प्रदर्शन के बलबूते ही वेस्टइंडीज़ में होने वाले 2010 विश्वकप ट्वेंटी-20 में भारतीय क्रिकेट टीम के 15 खिलाड़ियों में शामिल होने का मौका मिला है।

देखा जाए तो आईपीएल के सभी संस्करणों के दौरान भारतीय क्रिकेट और भी निखरता गया है। यूं कहें कि वैश्विक पटल पर भारतीय टीम का अन्य टीमों पर भी इस दौरान काफी दबदबा रहा। यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि आईपीएल की वजह से ही भारतीय टीम को एक अच्छा बैकअप मिला है। कहने का अभिप्राय यह है कि आज भारत के पास ऐसे कई जोशिले खिलाड़ी विकल्प के तौर पर मौजूद हैं, जो किसी भी बड़े खिलाड़ी के किसी वजह से टीम से बाहर होने पर जगह ले सकते हैं।

अगर आईपीएल को भ्रष्ठाचार और मोदी से जोड़कर न देखा जाए, तो शायद यह कुछ खिलाड़ियों के लिए एक अच्छे प्लेटफॉर्म के रूप में साबित हुआ है। चूंकि खेलप्रेमियों को जो चाहिए था, उसमें आईपीएल बिल्कुल खरा उतरा है।

Saturday, February 13, 2010

क्या यही प्यार है...














हमेशा की तरह इस बार बुजुर्गों ने नहीं कहा। हाँ लेकिन युवापीढ़ी ने जरूर कहा। वैलेंटाइन डे यानि के प्रेमियों का पर्व। दो दिल का मिलन। इस दिन कोई प्यार का हाल-ए-दिल बयां करता है तो कोई अपनी वैलेंटाइन के लिए पूरा दिन न्यौछावर करता है।

14 फ़रवरी । हाँ। प्रेमपर्व। प्रेम के पंछियों का पर्व। जिस तरह एक बच्चे को उसका तोहफा उसे सबसे अजीज होता है। ठीक उसी प्रकार प्रेमी पक्षी एक दुसरे के लिए अपने आप को तोहफा समझते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने "समझते हैं" क्यों लिखा। क्या लगता है आपको। क्या वाकेई में प्रेम जैसा कुछ है आज के दौर में। दो-चार प्रेम कि बाते कर लेने मात्र से प्रेम नहीं हो सकता है।

आज प्रेम कि परिभाषा बदल चुकी है। प्रेम केवल स्वार्थ मात्र रह गया है। जी हाँ केवल स्वार्थ। जिसके साथ जीने मरने कि कसमें खायीं थी। आज उसी को हम समझ नहीं रहे। अगर कोई लड़की परिस्तिथिवश अपने प्यार को प्यार नहीं दे पा रही हो तो इसका मतलब ये तो बिलकुल ही नहीं है कि प्रेमी आक्रोश में आकर उसकी जान ले ले।

ये कैसा प्यार है। हाँ शायद आज के दौर में यही प्यार है।

मैं उन तमाम प्रेमियों को सन्देश देना चाहता हूँ कि प्यार जबरदस्ती कि चीज़ नहीं होती। प्यार तो एक एहसास है जिसे अलफ़ाज़ कि जरूरत नहीं होती.... फिर भी हैप्पी वैलेंटाइन डे।

Happy Valentine Day...















If u luv someone
No need to set her free or do suspect her
No need to say about that she will come or not
It's over to u that
Make that person happy
whom u luv d most
Than see How d life goes on...

Friday, February 5, 2010

एहसास माँ को...

पता नहीं पर क्यूँ लेकिन लिखने का मन किया और लिख डाला। हर बार की तरह 4 फ़रवरी की सुबह भी मेरे लिए एक नया सवेरा लेकर आया। सब कुछ ठीक चल रहा था ऑफिस में भी मस्ती के साथ पूरा दिन बीता लेकिन होनी को कौन टाल सकता हैजो होना है वह हो कर ही रहेगा

मैं
थोड़ा भावुक हूँ इसलिए भावनाओं में जल्दी बहक जाता हूँ28 फ़रवरी को रंगों का पर्व है और इस दिन हर कोई अपने रंग में सराबोर रहता है मन में अजीब सा कौतुहल घर जाने को लेकिन उफ़! ये काम कमबख्त पीछा ही नहीं छोड़ता। मेरी बॉस। काफी एनर्जेटिक और हार्डवर्कर भी। मुझसे कहा ग्वालियर जाना है। मैंने पहले कहा था न। भावुक। हाय ये कमजोर दिल। नहीं माना। ले ली टेंशन। मन में दो बातें घर कर गयीं। फिर क्या, एक ओर घर की याद दूसरी ओर बॉस की बात।

शाम को ऑफिस में ब्लॉग देखा फिर देखी घड़ी। घड़ी की सुई बता रही थी कि वापस जाने का वक़्त हो चला है। पहली बार दोस्त के साथ न जाकर अकेले ही निकल गया। लेकिन इस वक़्त भी अकेला नहीं था। साथ में थी मन में दो बातें। जो आपस में टकरा रही थी।

बाहर सड़क पर ट्रैफिक भी जबरदस्त थी। मैं चला जा रहा था कि अचानक सामने से मारूति अल्टो से जबरदस्त टक्कर हो गई। एक पल तो कुछ समझ में ही नहीं आया कि क्या हुआ। लेकिन भगवान और परिवार कि आशीष कि वजह से मुझे कुछ नहीं हुआ। सारे जख्म मेरी गाड़ी ने अपने ऊपर ले लिया।

लेकिन इन सब से दूर बैठी मेरी माँ को मेरे दर्द का एहसास हुआ और एक्सिडेंट के ठीक आधे घंटे बाद घर से पापा का कॉल आया। सबसे पहले मुझसे पुछा वहां सबकुछ ठीक है कि नहीं। मम्मी चिंता कर रही है और तुम फ़ोन भी नहीं करते हो। इतना कहते ही माँ ने फिर मेरा हाल पुछा। मैं घबरा गया। क्या बताऊँ। मैंने कहा कि यहाँ सब ठीक है...

लेकिन ये माँ कि ममता ही है जो उतनी दूर हो कर भी अपने बेटे पर आये खतरे को भांप लिया।

Monday, February 1, 2010

संवेदना

हर दिन हजारों मौत मरता हूं
जब भी होता हूं अखबार और चैनलों से रूबरू,
देख चारों ओर
मारकाट, अत्याचार और बलात्कार।
पूरे शरीर में एक सिहरन सी उठती है।

ख़बर में आज एक और इज्जत हुई तार-तार
फिर हुई नारी शक्ति लाचार, खूनी व वहसियों की शिकार
वहीं अपनो ने ही
धारदार हथियार से
अपने ही बंधुओं पर किया वार

यह क्या हो रहा है?
प्रभु भी सोच रहे होंगे, कितना बदल गया है संसार।
जिस बुद्धिजीवी प्राणी की रचना की
आज वही सृष्टि का
नाश करने पर उतारू हो गए है।

Sunday, January 17, 2010

मन में एक डर सा है














पता नहीं पर क्यूँ लगता है,
पास हो के भी दूर लगती हो
मन में एक डर सा है
खो न दूं कहीं तुम्हें

महीने भर कटा रहा
अजब सा लगता रहा
लगा जैसे धड़कने तेज हो गई
रातें और मुश्किल होती गई

एक ओर है दुनियादारी
दूजा है तेरी यारी
पलपल मेरी जान है जाती
मुझको तेरी याद सताती

मन में एक डर सा है
खो न दूं कहीं तुम्हें

Saturday, January 9, 2010

शहीद की लाईव मौत


यह शर्मनाक घटना तमिलनाडु के तिरुनलवली जिले की है।



वहां पड़ा था और उसके सामने से ७० कारों का काफिला निकल गया, पास हो के भी कोई नहीं था उसके पास। जाबांज था वो। समाज की गंदगी को मिटाने की एक छोटी सी कोशिश की थी उसने। सफलता के चार कदम उसने भी बढ़ाये थे। शुक्रवार के पहले एक हंसते हुए परिवार का सदस्य था। देर रात घर में कोई अपना उसका इंतजार पलके बिछाए कर रहा था। किसे पता था कि वह कभी नहीं लौट कर आएगा। पिछले वर्ष ज्योतिषों के मुख से सुना था कि साल की शुरुआत ग्रहण से होगी। हर कोई इस ग्रहण के प्रसाद का भागीदार होगा। लेकिन इसमें उसकी क्या गलती थी? बस इतना कि समाज में पनपे एक गंदे कीड़े की दंष से उसमें रह रहे लोगों को उसके दंश से मुक्त करना।

आर. वेत्रिवेल नाम था उस जाबांज एसआई का। मारा गया दुष्मनों के हाथ। एक दुश्मन ने दुश्मनी निभाई और दूसरे वो दो मंत्री। उनसे तो अच्छा दुश्मन भले। काश वेत्रिवेल दलित होता! तो शायद बात कुछ और ही होती। लेकिन इसमें भी उसका क्या दोष? वैसे भी किस्मत का मारा था वो।

लाईव आज की पहली डिमांड। सबकुछ लाईव होना चाहिए। अरे! वह भी किसी परिवार का सदस्य होगा। कोई तो होता जो उसे बचा पाता। आह! मैं तो भूल ही गया। वीडियों के रूप में उसकी यादें तो रही। मुझे माफ करना थोड़ा जज्बाती हो गया। क्या करूं ऐसे मुद्दे पर जल्दी आपा खो बैठता हूं।

नेता किसी का न होता। ये तो एसआई के तड़प-तड़पकर मरने के बाद आप सभी को पता चल ही गया होगा। आज एक वेत्रिवेल शहीद हुआ है कल कोई और। सिलसिला इसी तरह से चलता रहेगा और किसी न किसी रूप में फिर कोई हंसता परिवार मुरझाया हुआ फूल बन जाएगा। हम फिर टीवी चैनल पर किसी की लाईव मौत को हाथ पर हाथ धरकर देखेंगे।

कोई है जो उन बेशर्म मंत्रियों को कठघरे में लाएगा। क्योंकी बाकी बचे बेशर्म छिंटाकशीं करेंगे। कहां गई संवेदना?